clueless
somewhere in between
हम तो बस ऐसे ही चल रहे हैं
मंज़िल का पता नहीं।
गलत ही सही, कोई तो राह दिखा दे,
कहीं पर तो पहुँचा दे।
मायूस होना चाहते हैं,
लेकिन कोई वजह भी नहीं।
ऐसे तो क्या ढूँढेंगे,
चाहिए क्या, वह पता भी नहीं।
हर बार संभल जाना आसान होता है,
पर बिखर कर खुद को ढूँढना है।
अक्सर सुना है लोगों से,
वहीं से असली शुरुआत होती है।
अधूरे पन्नों से भागते हैं,
मुकम्मल कहानी कैसे बनेगी?
सुहाना अंत देखना चाहते हैं,
बस सोचते रहे — शुरू कहाँ से करें।

